अदालतों ने क्या कहा है
जब छोटी विवादित रकम पर पूरा खाता रुका हो, तब काम आने वाले निर्णय।
उच्च न्यायालयों के सामने ये मामले थोक में आ रहे हैं, और निर्णयों की दिशा एक जैसी है: रोक विवादित रकम के अनुपात में होनी चाहिए।
राजस्थान उच्च न्यायालय, 20 अगस्त 2026
श्री बालाजी एंटरप्राइजेज़ बनाम भारतीय रिज़र्व बैंक में 105 रिट याचिकाएँ एक साथ तय करते हुए न्यायालय ने विस्तृत ढाँचा तय किया। जहाँ विवादित रकम पहचानी जा सकती है और व्यापक फ़्रीज़ का कोई आधार नहीं है, वहाँ खाता चालू रहने दिया जाए और सिर्फ़ विवादित रकम पर लियन या होल्ड रहे। न्यायालय ने कहा कि यदि कथित धोखाधड़ी ₹500 की है और खाते में ₹5 लाख हैं, तो जाँच का उद्देश्य सामान्यतः ₹500 सुरक्षित रखने से पूरा होता है, न कि बाक़ी रकम से खाताधारक को वंचित करने से। यह भी कहा कि “संदिग्ध लेन-देन”, “म्यूल अकाउंट” या “लेयर-1 खाता” जैसे शब्द अपने आप में पूरे खाते को अनिश्चितकाल तक रोकने का पर्याप्त कारण नहीं हैं।
केरल उच्च न्यायालय
डॉ. सजीर बनाम भारतीय रिज़र्व बैंक, जो SOP के क़ानूनी प्रावधानों वाले परिशिष्ट में भी दर्ज है, में न्यायालय ने कहा कि रोक आनुपातिक होनी चाहिए और पुलिस माँग-पत्र में बताई गई विशिष्ट रकम तक सीमित रहनी चाहिए, न कि पूरा खाता रोका जाए; साथ ही पुलिस को समय पर बैंक को बताना होगा कि आंशिक रोक जारी रखनी है या नहीं।
मद्रास उच्च न्यायालय
मोहम्मद सैफ़ुल्लाह बनाम भारतीय रिज़र्व बैंक, यह भी SOP के परिशिष्ट में है, में न्यायालय ने बैंक को खाता चालू करने का निर्देश दिया, जहाँ लगभग ₹2.5 लाख की विवादित रकम के बदले लगभग ₹9.7 लाख एक साल से अधिक रोके गए थे; न्यायालय ने कहा कि रकम या अवधि पर विशेष कारण बताए बिना पूरा खाता रोकना जीविका और व्यवसाय के अधिकार को प्रभावित करता है। लगभग ₹2.5 लाख का होल्ड बना रहने दिया गया।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, 2026
जहाँ जाँच एजेंसियों ने मजिस्ट्रेट को सीज़र की सूचना नहीं दी थी, वहाँ न्यायालय ने बैंक को खाता खोलने और सिर्फ़ विवादित रकम अलग सावधि जमा (FD) में रखने का निर्देश दिया, जो न्यायिक मजिस्ट्रेट के निर्णय के बाद ही जारी हो।
इनका उपयोग कैसे करें
इन्हें अपने अभ्यावेदन में एक विशिष्ट माँग के आधार के रूप में उद्धृत करें — रोक विवादित रकम तक सीमित की जाए — न कि इस आरोप के रूप में कि बैंक या पुलिस ने अवैध काम किया। बैंक अधिकारी आनुपातिकता के अनुरोध पर कार्रवाई कर सकता है; वैधता पर फ़ैसला वह नहीं, सिर्फ़ अदालत दे सकती है। यह भी ध्यान रखें कि ये निर्णय अपने राज्य में बाध्यकारी और अन्यत्र मार्गदर्शक होते हैं।
एक सावधानी: सर्वोच्च न्यायालय ने शेंटो वर्गीस बनाम जुल्फ़िकार हुसैन (2024) में कहा था कि मजिस्ट्रेट को सीज़र की सूचना देने में देरी अपने आप सीज़र को अमान्य नहीं करती, इसलिए सिर्फ़ इसी आधार पर मामला न खड़ा करें।
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